Pardesiyon ki Zindagi (Part:1) (कुर्बानियों की एक खामोश दास्तान)
परदेस में रहने वाले Pardesiyon ki Zindagi कैसी होती है इससे अक्सर घर वाले अंजान होते हैं की कैसे एक इंसान घर की जिम्मेदारी और बोझ उठाते हुवे अपनी पूरी जवानी कुर्बान कर देता है !
हर इंसान की ज़िंदगी में एक मोड़ ऐसा आता है जब जिम्मेदारियाँ उसे अपने सपनों से ज़्यादा अपनों की ज़रूरतों की परवाह करने पर मजबूर कर देती हैं। यही वक्त होता है जब कई लोग अपने घर-परिवार से दूर, परदेस का रास्ता चुनते हैं—सिर्फ इसलिए कि उनके अपने आराम से जी सकें। पर क्या किसी ने कभी सोचा है कि उस इंसान की अपनी ज़िंदगी का क्या होता है?
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कुर्बानियों की शुरूआत:
शादी के कुछ साल बाद जब ज़िंदगी एक नए मोड़ पर आती है, तो बहुत से लोग अपने सपनों को किनारे कर, घर की खुशियों के लिए परदेस का रास्ता चुनते हैं। वो सोचते हैं—मां-बाप की आँखों में रोशनी लाऊँगा, भाई-बहनों की पढ़ाई पूरी कराऊँगा, बीवी-बच्चों को हर वो चीज़ दूँगा जो उन्हें चाहिए। इसी सोच के साथ वो अपने वतन, अपनी मिट्टी, अपने लोगों से दूर चला जाता है। परदेस की गलियों में पसीना बहाने निकल पड़ता है। दिन-रात मेहनत करता है, ओवरटाइम करता है, खुद सादा खाता है मगर चाहता है की उसके घर वाले बीवी बच्चे अच्छे कपड़े पहनें, अच्छे खाना खाए।
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दिन-रात काम, ओवरटाइम, अकेलेपन की आग में जलते हुए वो सब कुछ सहता है। ईद आती है, दिवाली आती है, बच्चों की सालगिरह, बीवी की तबीयत, मां की यादें—मगर वो सिर्फ वीडियो कॉल और तस्वीरों में ही शामिल हो पाता है।
हर छुट्टी को वो गिनता है, हर दिन में वापसी के ख्वाब देखता है। जब कभी छुट्टियाँ मिलती हैं, वो दौड़ा चला आता है अपने वतन, अपनी मिट्टी की खुशबू, और अपनों के चेहरों की मुस्कान के लिए। मगर छुट्टी खत्म होते ही वापस चला जाता है... उसी तन्हा परदेस में।
फिर वही परदेस, वही तन्हाई, वही काम का बोझ उसका इंतज़ार कर रहा होता है। इस चक्कर में धीरे-धीरे उसकी जवानी गुज़र जाती है। न अपने लिए कुछ कर पाता है, न कोई शौक पूरा कर पाता है।
ज़िन्दगी के आख़िरी पड़ाओ
वक़्त बीतता है, जवानी ढल जाती है, और आखिरकार जब वो सब कुछ छोड़कर वापस लौटता है, तो पाता है कि बच्चे बड़े हो चुके हैं, बीवी को अब उसके बिना रहने की आदत हो गई है। मां-बाप शायद इस दुनिया में नहीं रहे। और वो? वो सिर्फ एक पराया सा शख्स बनकर रह गया है अपने ही घर में।
सबकी जरूरतें पूरी करते-करते कब उसकी उम्र ढल गई, कब वो अपनों से पराया हो गया कुछ पता ही नहीं चला! अब इस उमर में वो खुद दूसरों का मोहताज हो गया,उसकी खुद की ज़रूरतों का वक़्त आ गया! घर लौटने पर अब उसे एहसास होता है कि अब उसकी किसी को जरूरत ही नहीं रही , उसके साथ बैठने या वक्त बिताने के लिए किसी के पास वक्त ही नहीं है! सभी अपनी अपनी दुनिया में मसरूफ़ हैं,अब सब उसे एक ज़िम्मेदारियों के पूरा करने वाले के तौर पर देखने लगे हैं। बीवी-बच्चे, जो सालों तक उसके बिना जीते रहे, अब उन्हें इस के बग़ैर ही जीने की आदत हो गई है ! अब उसकी मौजूदगी को अपनी आदत में जगह नहीं दे पाते। उसकी मौजूदगी उन्हें अच्छी नहीं लगती है!अब उसकी बातें उन्हें हुक्मनामा लगता है! उसकी बातें उन्हें सहन नहीं होती है।
अब वो जिंदगी से थका हारा इंसान खुद को गैर समझने लगता है अपने ही घर में उसे लगता है कि वह एक अजनबी ,एक मेहमान बन कर रह गया है ! और सोचने लगता है कि जिनके के लिए मैने अपनी सारी उमर गंवा दी, सारी कमाई लगा दी आज उनके पास वक्त नहीं के थोड़ा मुझे वक्त दे सकें,मेरे पास बैठ कर मेरी तन्हाइयों को दूर कर सकें.......😥😥😥
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एक कड़वा सच:
यह एक कड़वा मगर अटल सच है — इंसान परदेस की तपती हवाओं में अपने घरवालों की ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए, उनकी जिंदगी संवारने के लिए अपनी पूरी जवानी कुर्बान कर देता है। वह तन्हाई ओढ़े, अपनी इच्छाओं को दबाकर, दिन-रात सिर्फ अपनों के लिए जीता है। हर खुशी, हर आराम को पीछे छोड़कर, वह सिर्फ इस उम्मीद में जीता है कि उसके त्याग की कभी तो कद्र होगी, उसे भी प्यार और इज्जत मिलेगी।
मेहनत उसकी होती है, लेकिन उस मेहनत का फल दूसरों के हिस्से में जाता है। वह अपने ही कमाए पैसों को खुद पर खर्च करने से हिचकता है। और जब अपने ही उसके एहसासों को न समझें, तब वह मुस्कुराता तो है... पर हर मुस्कान के पीछे एक टूटा हुआ दिल छुपा होता है। वह रोज़ अंदर ही अंदर मरता है, बिखरता है... और फिर भी कुछ नहीं कहता — बस चुपचाप सहता रहता है।
मगर अफसोस, जब वही अपने उसके जज़्बातों को समझ नहीं पाते, उसकी कुर्बानियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं — न तो उसका दर्द महसूस करते हैं और न ही उसे सच्चा अपनापन दे पाते — तब वह इंसान बाहर से भले ही मजबूत नज़र आए, भीतर ही भीतर चुपचाप बिखर जाता है, टूटता है।
यह है Pardesiyon ki Zindagi ,परदेस में रहने वालों की ज़िंदगी सिर्फ पैसे कमाने की कहानी नहीं होती, ये त्याग, दर्द, और अकेलेपन की एक लम्बी दास्तान होती है। ये वो लोग होते हैं जो अपने घर वालों के लिए अपने जज़्बातों और ज़िंदगी की खुशियों को मार देते हैं। ज़रूरत है कि हम ऐसे लोगों को सिर्फ एक कमाने वाले नहीं, बल्कि एक इंसान समझें — जो प्यार और अपनेपन का उतना ही हकदार है जितना कोई और। क्योंकि जब वो घर लौटता है, तो वो सिर्फ थका हुआ शरीर नहीं, बल्कि एक टूटा हुआ दिल भी साथ लाता है।
मगर अफसोस, जब वही अपने उसके जज़्बातों को समझ नहीं पाते, उसकी कुर्बानियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं — न तो उसका दर्द महसूस करते हैं और न ही उसे सच्चा अपनापन दे पाते — तब वह इंसान बाहर से भले ही मजबूत नज़र आए, भीतर ही भीतर चुपचाप बिखर जाता है, टूटता है।
"वो परदेस की गलियों में अपनी तन्हाई से रोज़ लड़ता है,अपने अरमानों को खुद अपने हाथों से दफन करता है,बस इसलिए कि उसके अपने चैन से जी सकें।पैसा कमाता है, मगर अपनी जेब से नहीं, अपने जज़्बातों से चुकाता है।और फिर भी जब अपने उसकी कुर्बानी को समझने के बजाय उसे नजरअंदाज कर दें,तो वो इंसान बाहर से तो मुस्कुराता है...मगर अंदर ही अंदर हर रोज़ थोड़ा और टूट जाता है।"
नतीजा (Conclusion):
यह है Pardesiyon ki Zindagi ,परदेस में रहने वालों की ज़िंदगी सिर्फ पैसे कमाने की कहानी नहीं होती, ये त्याग, दर्द, और अकेलेपन की एक लम्बी दास्तान होती है। ये वो लोग होते हैं जो अपने घर वालों के लिए अपने जज़्बातों और ज़िंदगी की खुशियों को मार देते हैं। ज़रूरत है कि हम ऐसे लोगों को सिर्फ एक कमाने वाले नहीं, बल्कि एक इंसान समझें — जो प्यार और अपनेपन का उतना ही हकदार है जितना कोई और। क्योंकि जब वो घर लौटता है, तो वो सिर्फ थका हुआ शरीर नहीं, बल्कि एक टूटा हुआ दिल भी साथ लाता है।
और एक सपना लेकर आता है कि इस बुढ़ापे वाली उमर में उसे अपनों का साथ और प्यार मिले लेकिन अफसोस की उसके सपने सपने ही रह जाते हैं! ऐसे लोगों की क़दर करें , इज़्ज़त दें, मुहब्बत दें,उनके साथ बैठें, वक्त दें ताकि उन्हें भी थोड़ी खुशियां मिल सके!
परदेस की ज़िंदगी एक ऐसी कहानी है जिसमें मुस्कानें कम और कुर्बानियाँ ज़्यादा होती हैं। ऐसे लोग जो अपने लिए नहीं, अपनों के लिए जीते हैं—हमें उनकी एहसासों की कदर करनी चाहिए। वो सिर्फ "कमाने वाला" नहीं, एक इंसान है—जिसे भी प्यार चाहिए, अपनापन चाहिए, इज्ज़त चाहिए।
जब वो थक-हारकर लौटता है, तो उसे ताने नहीं, तसल्ली चाहिए; सवाल नहीं, सुकून चाहिए।
एक गुज़ारिश है... अगर आपके घर में भी कोई परदेस में है, तो उसे सिर्फ पैसे भेजने वाला मत समझिए,
बल्कि वो आपकी खुशियों के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी कुरबान करने वाला एक खामोश हीरो है। उसकी इज़्ज़त करें, क़दर करें उसे वक्त दें ,उसके जज़्बात तन्हाइयों और दर्द को समझें,
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FAQs:
1. परदेस में रहने वालों की सबसे बड़ी मुश्किल क्या होती है?
परदेस में रहने वालों को सबसे ज़्यादा तन्हाई, अपनों से दूरी और भावनात्मक कमी का सामना करना पड़ता है।
2. क्या परदेस में कमाई आसान होती है?
नहीं, परदेस में कमाई आसान नहीं होती। दिन-रात की मेहनत, ओवरटाइम, और कई बार अपमान सहकर पैसा कमाना पड़ता है।
3. परदेस में रहने वाले अपने परिवार से कैसे जुड़े रहते हैं?
वो वीडियो कॉल, मैसेज, और पैसों के ज़रिए अपने परिवार से जुड़े रहते हैं, लेकिन फिज़िकल दूरी और भावनात्मक खाई बढ़ती जाती है।
4. क्या परदेसियों की कुर्बानी की कद्र होती है?
कई बार नहीं होती। अक्सर जब वो घर लौटते हैं, तो पाते हैं कि लोग उनके बिना जीने के आदी हो चुके हैं।
5. ऐसे लोगों को समाज और परिवार से क्या उम्मीद होती है?
उन्हें सिर्फ प्यार, इज्ज़त और समझदारी की ज़रूरत होती है। वो चाहते हैं कि उनके त्याग को पहचाना जाए।
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