insaan ki Pariksha/इंसान की परीक्षा

"फिर क्या तुम लोगों ने ये समझ रखा है कि यूँ ही जन्नत में दाख़िला तुम्हें मिल जाएगा, हालाँकि अभी तुम पर वो सब कुछ नहीं गुज़रा है जो तुमसे पहले ईमान लानेवालों पर गुज़र चुका है? उन लोगों पर सख़्तियाँ गुज़रीं, मुसीबतें आईं, हिला मारे गए, यहाँ तक कि वक़्त का रसूल और उसके साथी ईमानवाले चीख़ उठे कि अल्लाह की मदद कब आएगी? [ उस वक़्त उन्हें तसल्ली दी गई कि] हाँ, अल्लाह की मदद क़रीब है। सूरह अल बकरह

insaan ki Pariksha/इंसान की परीक्षा

insaan Ki Aazmaish
insaan ki Pariksha/इंसान की परीक्षा



दुनिया एक इम्तिहानगाह है, जहाँ हर इंसान को अलग-अलग हालात, मौकों और मुश्किलों के ज़रिए आज़माया जाता है। हर  insaan ki Pariksha होनी है !अल्लाह तआला ने कुरआन में कई जगह इंसान को यह बताया है कि उसकी ज़िन्दगी का यह सफ़र एक इम्तिहान है, जिसमें कभी खुशहाली से, कभी तंगहाली से, कभी सेहत से, और कभी बीमारी से उसकी परीक्षा ली जाती है। जो लोग सब्र और इस्तेक़ामत का मुज़ाहिरा करते हैं, वे अल्लाह के करीब हो जाते हैं और आखिरत में कामयाबी हासिल करते हैं।
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    अल्लाह तआला ने हमें ज़िंदगी के अलग-अलग मरहलों में आज़माइशों से गुज़रने का वादा किया है ताकि यह परखा जा सके कि कौन सब्र, शुक्र और इस्तिक़ामत के साथ इस इम्तिहान में कामयाब होता है।
    Note:
    हर insaan ki Pariksha होनी है और आज़माइश से होकर गुज़रना है और ऐसा नहीं कि अल्लाह हमें आज़माने के लिए कोई दूसरी ज़िंदगी देगा या दूसरी दुनिया में आज़माएगा, बल्कि इसी ज़िंदगी में, इसी दुनिया में हमें आज़माएगा। और वह आज़माइश कहीं भी हो सकती है—हमारे ही घर में अपनों के साथ, रिश्तेदारों के साथ, जो दौलत कमा रहे हैं उस दौलत के साथ, जो हमें अल्लाह ने सेहत और नेमतें दी हैं उनके साथ।




    आगे बढ़ने से पहले कुछ खास बातें :
    अल्लाह तआला ने इंसान को एक ऐसा मखलूक़ बनाया, जिसे यह अख़्तियार दिया गया कि वह सही और गलत के बीच फैसला कर सके। 

    ""क्या लोग यह समझते हैं कि उन्हें सिर्फ यह कहने पर छोड़ दिया जाएगा कि हम ईमान ले आए, और उनकी परीक्षा नहीं ली जाएगी?"


    अल्लाह ने हमें बताया है कि आसमानों और ज़मीन और ज़िंदगी व मौत की रचना, इन्सान को परखने के लिए की गई है। जो कोई उसकी हुक्म का पालन करेगा, उसे वह ईनाम देगा और जो कोई उसकी ना फर्मानी करेगा, उसे वह सजा देगा। कुरआन में अल्लाह तआला फरमाते हैं:

    "और वही है जिसने आसमानों और ज़मीन को छ: दिनों में पैदा किया- जबकि इससे पहले उसका अर्श [ सिंहासन] पानी पर था - ताकि तुमको आज़माकर देखे कि तुममें कौन बेहतर अमल करने वाला है ! 
     [हूद 11:7] 
    फ़िर फरमाता है :
    "वह (अल्लाह) जिसने मौत और जिंदगी को पैदा किया ताकि वह देख सके कि तुममें से कौन बेहतर अमल करता है।"(सूरह अल-मुल्क :2)

    यह दुनिया इंसान के लिए एक इम्तिहानगाह है, जहां उसे अपने अमल के जरिए अल्लाह की रज़ा हासिल करनी है।
    Note:
    अल्लाह ने इंसान को महज़ इल्म व अक़्ल की क़ुव्वतें देकर ही नहीं छोड़ दिया, बल्कि साथ-साथ उसकी रहनुमाई भी की, ताकि उसे मालूम हो जाए कि शुक्र का रास्ता कौन-सा है और कुफ़्र का रास्ता कौन सा, और इसके बाद जो रास्ता भी वो इख़्तियार करे उसका ज़िम्मेदार वो ख़ुद हो। सूरा बलद में यही मज़मून इन अल्फ़ाज़ में बयान किया गया है वह्दैनाहुन-नज्दैन और हमने उसे (ख़ैर व शर के) दोनों रास्ते नुमाया करके बता दिये। और सूरा शम्स में यही बात इस तरह बयान की गई है व-नफ़्सिंव-वमा-सव्वा-ह फ़-अल-ह-म-ह फ़ुजू-र-ह व-तक़वा-हा और क़सम है (इन्सान के) नफ़्स की और उस ज़ात की जिसने उसे (तमाम ज़ाहिरी और बातिनी क़ुव्वतों के साथ) तैयार किया, फ़िर उसका फ़ुजूर और उसका तक़वा दोनों उस पर इलहाम कर दिये। इन तमाम वज़ाहतों को निगाह में रख कर देखा जाए, और साथ-साथ क़ुरआन मजीद के उन तफ़्सीली बयानात को भी निगाह में रखा जाए जिनमें बताया गया है कि अल्लाह ने इन्सान की हिदायत के लिये दुनिया में क्या-क्या इन्तिज़ामात किये हैं, तो मालूम हो जाता है कि इस आयत में रास्ता दिखाने से मुराद रहनुमाई की कोई एक ही सूरत नहीं है, बल्कि बहुत सी सूरतें हैं जिनकी कोई हद्दो-इन्तिहा नहीं है इन्सान अगर इनसे आँखें बन्द कर ले, या अपनी अक़्ल से काम लेकर इन पर ग़ौर न करे, या जिन हक़ीक़तों की निशानदेही ये कर रही हैं उनको तस्लीम करने से जी चुराए, तो ये उसका अपना क़ुसूर है। अल्लाह ने अपनी तरफ़ से तो हक़ीक़त की ख़बर देने वाले निशानात उसके सामने रख देने में कोई कसर नहीं उठा रखी है।
    सूरः यासीन में अल्लाह का फ़रमान है कि:
    बेशक हम एक दिन मुर्दों को ज़िंदा करने वाले हैं। जो कुछ अ़मल वह आगे भेजते हैं, वो सब हम लिखते जा रहे हैं, और जो कुछ निशान उन्होंने पीछे छोड़े है, वो भी हम लिख रहे हैं। हर चीज़ को हमने एक खुली किताब में लिख रखा है।इससे मालूम हुआ कि इम्तिहान के बाद हमें अपने कर्मो का हिसाब भी देना है 

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    अब आइए ये जानें की अल्लाह कैसे और किन हालात में अपने बंदों की परिक्षा लेता है 

    आज़माइश अच्छे लोगों को ऊँचा उठाने के लिए आती है, जबकि पाप की सज़ा इंसान को तौबा और सुधार की ओर लाने के लिए।

    अल्लाह कैसे परिक्षा लेता है?

    अल्लाह तआला फरमाते हैं:

    1."وَ لَنَبۡلُوَنَّکُمۡ بِشَیۡءٍ مِّنَ الۡخَوۡفِ وَ الۡجُوۡعِ وَ نَقۡصٍ مِّنَ الۡاَمۡوَالِ وَ الۡاَنۡفُسِ وَ الثَّمَرٰتِ ؕ وَ بَشِّرِ الصّٰبِرِیۡنَ

    "व लनबलुवन्नकुम बिशयइम मिन अल-खौफि वल-जूइ व नक्सिम मिन अल-अमवालि वल-अंफुसि वस-समराति, व बश्शिरिस-साबिरीन"(अल-बक़रा: 155)

    "और हम ज़रूर तुम्हें आज़माएंगे कुछ खौफ़, भूख, और माल, जानों और फलों के नुक़सान से, और सब्र करने वालों को खुशख़बरी दे दो।"

    2. "अ-हसिबन्नासु अय्युतरकू अय्यकूलू आमन्ना वहुम ला युफ़तनून" (अल-अनकबूत: 2)
    "क्या लोग यह समझते हैं कि उन्हें सिर्फ यह कहने पर छोड़ दिया जाएगा कि हम ईमान ले आए, और उनकी परीक्षा नहीं ली जाएगी?"

    इन आयतों से यह साबित होता है कि अल्लाह इंसान को आज़माता है ताकि यह देखा जाए कि कौन सब्र और ईमान के साथ इस इम्तिहान में कामयाब होता है।

    नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:

    "إِنَّ عِظَمَ ٱلْجَزَاءِ مَعَ عِظَمِ ٱلْبَلَاءِ، وَإِنَّ ٱللَّهَ إِذَا أَحَبَّ قَوْمًا ٱبْتَلَاهُمْ, فَمَن رَضِيَ فَلَهُ ٱلرِّضَا، وَمَن سَخِطَ فَلَهُ ٱلسُّخْطُ" 

    "बड़ी परीक्षा के साथ बड़ा इनाम होता है, और जब अल्लाह किसी क़ौम से मोहब्बत करता है तो उसे आज़माइश में डाल देता है। जो राज़ी हो जाए, उसके लिए अल्लाह की रज़ा है, और जो नाराज़ हो, उसके लिए अल्लाह की नाराज़गी है।"(सुन्नन तिर्मिज़ी: 2396)

    "ما يُصِيبُ ٱلْمُؤْمِنَ مِنْ وَصَبٍ وَلَا نَصَبٍ وَلَا سَقَمٍ وَلَا حُزْنٍ حَتَّى ٱلْهَمِّ يُهَمُّهُ إِلَّا كَفَّرَ ٱللَّهُ بِهِ مِنْ خَطَايَاهُ


    "मुसलमान को जो भी तकलीफ़, बीमारी, ग़म, परेशानी या मायूसी लाहक़ होती है, यहाँ तक कि अगर उसे कोई चिंता भी सताए, तो अल्लाह उसके गुनाहों का कफ्फ़ारा कर देता है।"(सहीह बुखारी: 5641)

    अल्लाह इंसान की परीक्षा कैसे और किन हालात में लेता है?

    अल्लाह तआला इंसान को मुख़्तलिफ़ तरीकों से आज़माता है। कभी दौलत देकर, कभी गरीबी देकर, कभी सेहत देकर, कभी बीमारी देकर, कभी ताक़त देकर, और कभी कमज़ोरी देकर।

    1. माल और दौलत की परीक्षा


    अल्लाह तआला कुछ लोगों को बेशुमार माल देकर देखता है कि क्या वे इसे सही राह पर खर्च करते हैं या नाफरमानी में बर्बाद कर देते हैं।

    कुरआन में फ़रमाया:
    "إِنَّمَا أَمْوَٰلُكُمْ وَأَوْلَٰدُكُمْ فِتْنَةٌ ۚ وَٱللَّهُ عِندَهُۥٓ أَجْرٌ عَظِيمٌ"
    इन्नमा अमवालुकुम वा औलादुकुम फिटनतुं वल्लाहु इंदहू अज्रुन अज़ीम"(सूरह अल-तग़ाबुन: 15)
    बेशक तुम्हारे माल और औलाद तुम्हारे लिए एक परीक्षा हैं, और अल्लाह के पास बहुत बड़ा इनाम है।

    हदीस:
    रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया:
    "क़यामत के दिन आदमी के कदम उस वक्त तक नहीं हटेंगे जब तक उससे पाँच चीज़ों के बारे में सवाल न कर लिया जाए — उसमें एक है: अपने माल को कहाँ से कमाया और कहाँ खर्च किया।"(तिर्मिज़ी)

    2. तंगदस्ती और भूख की परीक्षा

    कुछ लोगों को अल्लाह तंगहाली और भूख में डालकर देखता है कि वे सब्र करते हैं या शिकायत करने लगते हैं।

    क़ुरआन:
    "وَلَنَبْلُوَنَّكُم بِشَىْءٍۢ مِّنَ ٱلْخَوْفِ وَٱلْجُوعِ وَنَقْصٍۢ مِّنَ ٱلْأَمْوَٰلِ وَٱلْأَنفُسِ وَٱلثَّمَرَٰتِ ۗ وَبَشِّرِ ٱلصَّـٰبِرِينَ"
    (सूरह अल-बक़रह: 155)
    "और हम तुम्हें अवश्य ही आज़माएँगे थोड़े डर, भूख, माल, जान और फल की कमी से — और सब्र करने वालों को खुशखबरी दे दो।"

    3. सेहत और बीमारी की परीक्षा

    सेहत अल्लाह की नेमत है, और बीमारी एक परीक्षा हो सकती है। कभी अल्लाह बीमारी देकर देखता है कि बंदा अल्लाह पर भरोसा करता है या मायूस हो जाता है।

    हदीस:
    रसूलुल्लाह (स.अ.) ने फ़रमाया:
    "जो बंदा बीमार होता है या उसे कोई दुख पहुँचता है, यहाँ तक कि अगर उसके पैर में काँटा भी चुभे, तो अल्लाह उसकी वजह से उसके गुनाह माफ़ कर देता है।"(बुखारी व मुस्लिम)

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    4. औलाद की परीक्षा

    औलाद अल्लाह की नेमत भी है और परीक्षा भी। नाफरमान औलाद मिलने पर सब्र और नेक औलाद मिलने पर सही परवरिश का इम्तिहान होता है।

    क़ुरआन:
    "يَا أَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تُلْهِكُمْ أَمْوَٰلُكُمْ وَلَآ أَوْلَـٰدُكُمْ عَن ذِكْرِ ٱللَّهِ ۚ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْخَـٰسِرُونَ"
    (सूरह अल-मुनाफिक़ून: 9)
    "ऐ ईमान वालो! तुम्हारे माल और औलाद तुम्हें अल्लाह की याद से गाफ़िल न कर दें, और जो ऐसा करे, वही घाटे में रहने वाले हैं।"

    5. इक्तिदार और ताक़त की परीक्षा

    अल्लाह कुछ लोगों को हुकूमत देकर देखता है कि वे अदल (न्याय) और इंसाफ़ करते हैं या ज़ुल्म और ज्यादती का रास्ता अपनाते हैं।

    क़ुरआन:
    "إِنَّ ٱللَّهَ يَأْمُرُكُمْ أَن تُؤَدُّوا۟ ٱلْأَمَـٰنَـٰتِ إِلَىٰٓ أَهْلِهَا ۖ وَإِذَا حَكَمْتُم بَيْنَ ٱلنَّاسِ أَن تَحْكُمُوا۟ بِٱلْعَدْلِ"
    (
    सूरह अन-निसा: 58)
    "बेशक अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है कि अमानतें उनके हक़दारों को दो, और जब लोगों के बीच फैसला करो तो इंसाफ से करो।"

    6. इल्म और जहालत की परीक्षा

    इल्म रखने वाला अगर उस पर अमल न करे, तो वह नाकाम हो जाता है, और जो लाइल्मी में गुमराह हो जाए, वह भी परीक्षा में फ़ेल हो जाता है।

    हदीस:
    रसूलुल्लाह (स.अ.) ने फ़रमाया:
    "क़ुरआन बहुत लोगों के लिए हिदायत है, लेकिन बहुतों के लिए मुसीबत भी बन जाता है, जो उस पर अमल नहीं करते।(मुस्लिम)
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    परीक्षा में कामयाबी का रास्ता

    अल्लाह तआला ने परीक्षा में कामयाबी के लिए कुछ बुनियादी उसूल बताए हैं:


    1. सब्र और दुआ:

    "يَا أَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱسْتَعِينُواْ بِٱلصَّبْرِ وَٱلصَّلَوٰةِ إِنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلصَّٰبِرِينَ"

    "या अय्युहल्लज़ीना आमनू इस्तईनू बिस्सब्री वस्सलाति, इन्नल्लाहा मअस्साबिरीन" (अल-बक़रा: 153)
    "ऐ ईमान वालो! सब्र और नमाज़ के ज़रिए मदद माँगो, बेशक अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है।"

    2. अल्लाह पर भरोसा:

    "وَمَن يَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ فَهُوَ حَسْبُهُ"
    "व मं यतवक्कल अलाल्लाहि फहुवा हसबुहू" (अल-तलाक़: 3)
    "और जो अल्लाह पर भरोसा करे, वह उसके लिए काफी है।"

    3. इस्तेग़फार और तौबा:

    परीक्षा गुनाहों का कफ्फ़ारा भी होती है, इसलिए हर हाल में अल्लाह से माफी माँगनी चाहिए।

    4. शुक्र गुज़ारी:

    "لَئِن شَكَرْتُمْ لَأَزِيدَنَّكُمْ"
    लइन शकरतुम लअज़ीदन्नकुम" (इब्राहीम: 7)
    "अगर तुम शुक्र करोगे तो मैं तुम्हें और ज्यादा दूँगा।"

    Conclusion:


    अल्लाह हर इंसान को मुख़्तलिफ़ अंदाज़ में आज़माता है हर insaan ki Pariksha लेता है!  जो लोग सब्र, शुक्र और अल्लाह पर भरोसा करते हैं, वे इस इम्तिहान में कामयाब हो जाते हैं। हमें चाहिए कि हर हाल में अल्लाह की तरफ़ रुजू करें, नेक आमाल करें और अपनी आख़िरत सँवारने की कोशिश करें।

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    FAQs: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
    1. क्या मुसीबतें सिर्फ पापियों पर आती हैं?
    उत्तर : नहीं, मुसीबतें सिर्फ पापियों पर नहीं आतीं, बल्कि अच्छे लोगों और नबियों पर भी आई ताकि उनके दर्जे बुलंद किए जाएँ।
    2. अल्लाह मोमिनों को आज़माइश में क्यों डालता है?
    उत्तर : ताकि उनके सब्र, ईमान और भरोसे की परीक्षा ले और उन्हें और अधिक आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करे।
    3. आज़माइश और पाप की सज़ा में क्या अंतर है?
    उत्तर : आज़माइश अच्छे लोगों को ऊँचा उठाने के लिए आती है, जबकि पाप की सज़ा इंसान को तौबा और सुधार की ओर लाने के लिए।
    4. क्या नबी भी आज़माइशों में डाले गए थे?
    उत्तर : जी हाँ, नबियों को सबसे ज़्यादा आज़माइशों में डाला गया ताकि वे इंसानों के लिए सब्र और भरोसे की बेहतरीन मिसाल बनें।
    5. आजमाईश में कामयाबी के बुनियादी असूल क्या है?
    उत्तर : आजमाईश में पड़ने पर इंसान को अल्लाह पर सच्चे दिल से भरोसा , शुक्र गुजारी और मग़फिरत तलब करते रहना चाहिए। 

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