Bichhu Aur insaan ki Haqeeqat/बिच्छू और इंसान की हक़ीक़त
प्रकृति में हर जीव अपने बच्चों से प्रेम करता है और उनकी परवरिश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देता है। लेकिन कुछ प्रजातियाँ ऐसी भी हैं, जिनकी प्रकृति क्रूरता को दर्शाती है। ऐसी ही एक प्रजाति बिच्छू की है। बिच्छू की मातृत्व कहानी हमें एक गहरी सीख देती है, जो हमारे समाज से बहुत मेल खाती है। यह लेख Bichhu Aur insaan ki Haqeeqat इसी से मुतल्लिक़ है!
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बिच्छू की माँ की बलिदान भरी कहानी
जब एक मादा बिच्छू बच्चे पैदा करती है, तो वह उन्हें अपनी पीठ पर बिठा लेती है। ये छोटे-छोटे बिच्छू किसी और भोजन की आवश्यकता नहीं समझते, बल्कि वे अपनी ही माँ की पीठ से मांस नोच-नोच कर खाने लगते हैं। माँ के पास इतनी ताकत होती है कि वह उन्हें रोक सके, लेकिन वह ऐसा नहीं करती। वह न तो कोई शिकायत करती है, न ही कोई विरोध, बस चुपचाप इस दर्द को सहती रहती है।
धीरे-धीरे, बच्चे इतने बड़े हो जाते हैं कि वे खुद चलने-फिरने के काबिल हो जाते हैं। लेकिन तब तक माँ इतनी कमजोर हो चुकी होती है कि वह चल भी नहीं पाती। आखिरकार, वही माँ जो अपने बच्चों के लिए सब कुछ सहती रही, उनकी भूख मिटाने के लिए खुद को कुर्बान कर देती है और मर जाती है। बच्चे बिना कोई पछतावा किए अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो जाते हैं।
क्या आज के समाज में भी यही हो रहा है?
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Bichhu Aur insaan ki Haqeeqat |
अगर हम गौर करें, तो हमें एहसास होगा कि आज के समय में भी कई इंसान बिच्छू के बच्चों जैसे ही बन चुके हैं।
माता-पिता अपनी पूरी ज़िंदगी अपने बच्चों की परवरिश में लगा देते हैं। जब बच्चा जन्म लेता है, तो माँ रातों को जागकर उसकी देखभाल करती है। पिता सर्दी, गर्मी, बारिश की परवाह किए बिना दिन-रात मेहनत करता है ताकि अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा, अच्छा भविष्य और एक सुरक्षित जीवन दे सके। वे अपनी इच्छाओं का त्याग कर केवल अपने बच्चों की खुशियों के लिए जीते हैं।
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लेकिन जब वही बच्चे बड़े हो जाते हैं, जीवन में सफल हो जाते हैं, तो उनमें से कई अपने माता-पिता को भूल जाते हैं। जब माता-पिता को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तो वे उन्हें बोझ समझने लगते हैं। कई तो अपने माता-पिता की खबर तक नहीं लेते, उनकी जरूरतों को नजरअंदाज कर देते हैं और अपने ही स्वार्थ में लिप्त हो जाते हैं।
यह स्थिति बिल्कुल बिच्छू के उन निर्दयी बच्चों की तरह ही है, जो अपनी ही माँ का मांस खाकर बड़े होते हैं और फिर उसे मरने के लिए छोड़ देते हैं।
कुरआन में अल्लाह फरमाता है:
हदीस में आता है:
"जो व्यक्ति अपने माता-पिता के चेहरे की ओर प्रेम से देखता है, उसे अल्लाह हज के बराबर सवाब देता है।" (शुअब उल ईमान, हदीस 7831)
लेकिन जब वही बच्चे बड़े हो जाते हैं, जीवन में सफल हो जाते हैं, तो उनमें से कई अपने माता-पिता को भूल जाते हैं। जब माता-पिता को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तो वे उन्हें बोझ समझने लगते हैं। कई तो अपने माता-पिता की खबर तक नहीं लेते, उनकी जरूरतों को नजरअंदाज कर देते हैं और अपने ही स्वार्थ में लिप्त हो जाते हैं।
यह स्थिति बिल्कुल बिच्छू के उन निर्दयी बच्चों की तरह ही है, जो अपनी ही माँ का मांस खाकर बड़े होते हैं और फिर उसे मरने के लिए छोड़ देते हैं।
इस्लाम और माता-पिता के अधिकार
इस्लाम और अन्य धर्मों में माता-पिता की सेवा और सम्मान को सबसे बड़ी नेकी बताया गया है।कुरआन में अल्लाह फरमाता है:
"और अपने माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करो। यदि उनमें से कोई एक या दोनों बुढ़ापे की अवस्था तक पहुँच जाएँ, तो उन्हें ‘उफ़’ तक न कहो, न ही उन्हें झिड़को, बल्कि उनसे आदर और प्रेम से बात करो।" (सूरह इसरा: 23)
हदीस में आता है:
"पिता की खुशी में अल्लाह की खुशी है और पिता की नाराजगी में अल्लाह की नाराजगी है।" (तिर्मिज़ी, हदीस 1899)
"जो व्यक्ति अपने माता-पिता के चेहरे की ओर प्रेम से देखता है, उसे अल्लाह हज के बराबर सवाब देता है।" (शुअब उल ईमान, हदीस 7831)
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Conclusion:
यह है Bichhu Aur insaan ki Haqeeqat जिस से हमे सीख लेना चाहिए! यह दुनिया अस्थायी है, लेकिन माता-पिता का प्यार और उनकी दुआएं हमारी दुनिया और आखिरत (परलोक) दोनों को संवार सकती हैं। हमें चाहिए कि हम उनके प्रति कृतज्ञ रहें और उन्हें हर हाल में सम्मान दें, ताकि हम खुद भी अपने बच्चों के लिए एक अच्छा उदाहरण बन सकें।हमें चाहिए कि हम अपने माता-पिता को इज्ज़त दें, उन्हें समय दें, उनकी देखभाल करें और उनकी सेवा को अपने लिए सबसे बड़ा सम्मान समझें। माता-पिता की दुआओं में वह ताकत है जो हमें दुनियावी और आध्यात्मिक रूप से सफल बना सकती है।हमें यह सोचना चाहिए कि क्या हम अपने माता-पिता का सही हक अदा कर रहे हैं?
क्या हम उन्हें समय देते हैं, उनकी सेवा करते हैं?
क्या हम उनकी ज़रूरतों को समझते हैं, या सिर्फ अपनी दुनिया में व्यस्त हैं?
क्या हम उनके साथ वैसा ही व्यवहार कर रहे हैं, जैसा हम अपने बच्चों से भविष्य में उम्मीद रखते हैं?
अल्लाह हमें अपने माता-पिता की सेवा करने और उनका हक अदा करने की तौफीक दे, आमीन!
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FAQs:
प्रश्न 1: बिच्छू के बच्चे अपनी माँ को क्यों खाते हैं?
उत्तर: बिच्छू के बच्चे आमतौर पर अपनी माँ की पीठ पर कुछ दिनों तक रहते हैं। लेकिन यदि भोजन की कमी हो या माँ बहुत कमजोर हो जाए, तो वे अपनी ही माँ का मांस खाने लगते हैं। यह व्यवहार कुदरती परिस्थितियों में ही देखने को मिलता है।
प्रश्न 2: क्या यह सच है कि आज के समाज में लोग बिच्छू के बच्चों जैसे बन चुके हैं?
उत्तर: हां, कुछ हद तक यह सही है। आज कई लोग अपने माता-पिता की कुर्बानियों को भूलकर केवल अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं। वे अपने माता-पिता की जरूरतों का ध्यान नहीं रखते, जिससे यह तुलना सही बैठती है।
प्रश्न 3: इस्लाम में माता-पिता की सेवा का क्या महत्व है?
उत्तर: इस्लाम में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ा फर्ज बताया गया है। अल्लाह ने कुरआन में बार-बार माता-पिता के सम्मान और सेवा का हुक्म दिया है। हदीसों में भी उनकी आज्ञा का पालन करने और उनकी खुशी को अल्लाह की खुशी बताया गया है।
प्रश्न 4: हमें अपने माता-पिता के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए?
उत्तर: हमें अपने माता-पिता से प्रेमपूर्वक बात करनी चाहिए, उनकी सेवा करनी चाहिए, उनकी जरूरतों का ख्याल रखना चाहिए और उनके लिए हमेशा दुआ करनी चाहिए। उन्हें कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और उन्हें सम्मान देना चाहिए।
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