Deen me jazbaat aur andhi aqeedat/दीन में जज़्बात और आंधी अकीदत
दीन जज़्बात और अंधी अकीदत से नहीं बल्कि शरीयत ए मुहम्मदिया सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से चलता है। Deen me jazbaat aur andhi aqeedat की कोई अहमियत ही नही है।
हमारे मुआ़शरे में अक्सर ये देखने को मिलता है की इंसान Deen me jazbaat aur andhi aqeedat के चक्कर में शरीयत की ह़द को भी पार कर जाता है और उस चीज़ को दीन बनाना या दीन में शामिल करना चाहता है जो दीन का हि़स्सा ही नही है ,जिसका दीन में कोई वजूद ही नही है ! जैसे की हर साल चिल्ला चिल्ला कर, झंडे उठा उठा कर, जुलूस बनाकर, कहते फिरते हैं की ........हुज़ूर आ रहे है, हुज़ूर आ रहे है , तशरीफ़ ला रहे है ।ठीक ऐसे ही जैसे की नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के विसाल के बाद हज़रत उमर (रदियल्लाहो अन्हो) हाँथ में तलवार लिए मदीने की सड़कों पर कहते फिर रहे थे कि जिसने कहा कि हुज़ूर वफा़त पा गए तो उसकी गर्दन उड़ा दूंगा ।
(यह इस लिए था की नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के विसाल के बआ़द हज़रत उमर (रदियल्लाहो अन्हो) उनकी मोहब्बत में ,उनके अकीदत में जज़्बाती हो गए थे !)ये अमल दीनी नही खालिस जज़्बाती और मुहब्बत के गलवे के ज़ेरे असर हज़रत उमर से हो रहा था ।
और हज़रत उमर मस्जिद में गए और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के फ़ज़ाएल बयान कर के ये तक़रीर करने लगे कि जैसे एलिया को जैसे इदरीस को अल्लाह ने उठा लिया था, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम भी अल्लाह के पास गए है और वो जल्द ही लौट कर आ जाएंगे , हमारे बीच मे ।
वही एक और हस्ती भी थे, हज़रत अबु बकर (रदियल्लाहु अन्हो) , उन्होंने मस्जिद में दाख़िल होकर उ़मर फा़रूक को इशारा किया कि चुप हो जाओ, लेकिन हज़रत उ़मर मोहोब्बत के जोश में बोलते ही जा रहे थे, इस पर हज़रत अबु बकर ने तक़रीर शुरू की
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हज़रत अबु बकर का खुत्बा
अबू-बक्र (रज़ि०) आए तो उ़मर (रज़ि०) लोगों से कुछ कह रहे थे। अबू-बक्र (रज़ि०) ने कहा : उ़मर ! बैठ जाओ लेकिन उ़मर (रज़ि०) ने बैठने से इनकार किया। इतने में लोग उ़मर (रज़ि०) को छोड़ कर अबू-बक्र (रज़ि०) के पास आ गए और आप ने ख़ुतबा मस्नूना के बआ़द फ़रमाया : तुममें जो भी मुहम्मद (सल्ल०) की इ़बादत करता था तो उसे मालूम होना चाहिये कि आपकी वफ़ात हो चुकी है और जो अल्लाह तआ़ला की इ़बादत करता था तो (उसका माबूद) अल्लाह हमेशा ज़िन्दा रहने वाला है और उसको कभी मौत नहीं आएगी। अल्लाह तआला ने ख़ुद फ़रमाया है कि:"मुहम्मद सिर्फ़ रसूल हैं उन से पहले भी रसूल गुज़र चुके हैं। अगर वो वफात पा जायें या शहीद कर दिए जाएं तो क्या तुम अपनी एड़ियों के बल लौट जाओगे.....।इब्ने-अब्बास (रज़ि०) ने बयान किया : अल्लाह की क़सम ! ऐसा महसूस हुआ कि जैसे पहले से लोगों को मालूम ही नहीं था कि अल्लाह तआला ने ये आयत नाज़िल की है और जब अबू-बक्र (रज़ि०) ने उसकी तिलावत की तो सबने उन से ये आयत सीखी। अब ये हाल था कि जो भी सुनता था वही उसकी तिलावत करने लग जाता था। (ज़ोहरी ने बयान किया कि) फिर मुझे सईद-बिन-मुसैयब ने ख़बर दी कि उमर (रज़ि०) ने कहा : अल्लाह की क़सम! मुझे उस वक़्त होश आया जब मैंने अबू-बक्र (रज़ि०) को इस आयत की तिलावत करते सुना जिस वक़्त मैंने उन्हें तिलावत करते सुना कि नबी करीम (सल्ल०) की वफ़ात हो गई है तो मैं सकते में आ गया और ऐसा महसूस हुआ कि मेरे पाँव मेरा बोझ नहीं उठा पाएँगे और मैं ज़मीन पर गिर जाऊँगा।(सही बुखारी :4454)
और जब ये खुत्बा हज़रत उमर ने सुना की : जो कोई भी मुहम्मद की इबादत करता था, वो जान ले कि उनका इन्तिकाल हो चुका है और जो कोई उनके रब अल्लाह की इबादत करता था तो अल्लाह ज़िंदा है आज भी।
ये सुनकर उनका जोश ठंडा पड़ गया और उन्होंने अपने अमल से रुजू कर लिया और ये मान लिया कि हुज़ूर इस दुनियां से जा चुके है ।
Note: गौर करने वाली बात है की सभी सहाबा को ये यकीन हो गया की नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अब इस दुनिया में नही हैं वो अपने रब के पास जा चुके हैं और बरज़ख़ की दुनिया में ज़िंदा हैं इस दुनिया से उनका राब्ता कट चुका है ! लेकिन उम्मत में अक्सरियत ये समझ रही है की वो अपनी कबर में जिंदा हैं तभी तो तशरीफ लाते हैं !
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उम्मत के सामने दो अज़ीम हस्तियों - अबु बकर और उमर, दोनों का तर्ज़े अमल मौजूद है,इनमे से एक का अमल हकीकत पर मबनी है, असल वाकया, जो घट गया, उसको कुबूल कर लेने पर मबनी है
और दूसरे का अमल सिर्फ अकीदत और मोहोब्बत पर मबनी है, जिसमे जज़्बात का गलवा है और हकीकत को नज़रंदाज़ करना ।
अब उम्मत को चुनना और मानना था कि किसका तर्ज़े अमल अक्ल ओ हक़ाएक़ के ज़्यादा करीब है ? किसका तर्ज़ ए अमल काबिले कबूल है !
उम्मत के सामने दो अज़ीम हस्तियां:
उम्मत के सामने दो अज़ीम हस्तियों - अबु बकर और उमर, दोनों का तर्ज़े अमल मौजूद है,इनमे से एक का अमल हकीकत पर मबनी है, असल वाकया, जो घट गया, उसको कुबूल कर लेने पर मबनी है
और दूसरे का अमल सिर्फ अकीदत और मोहोब्बत पर मबनी है, जिसमे जज़्बात का गलवा है और हकीकत को नज़रंदाज़ करना ।
अब उम्मत को चुनना और मानना था कि किसका तर्ज़े अमल अक्ल ओ हक़ाएक़ के ज़्यादा करीब है ? किसका तर्ज़ ए अमल काबिले कबूल है !
लेकिन उम्मत बिलकुल इसके उलट चली और उम्मत ने हक़ाएक़ से मुंह मोड़ कर जज़्बात और अकीदत को अपनी ज़िंदगी मे जगह दे ली ।
जिसके नतीजे में उम्मत का बहुत बड़ा तबका हर साल रबी उल अव्वल के महीने में नारे लगता फिरता है कि
जिसके नतीजे में उम्मत का बहुत बड़ा तबका हर साल रबी उल अव्वल के महीने में नारे लगता फिरता है कि
हुज़ूर आ रहे है, हुज़ूर तशरीफ़ ला रहे है
जबकि हुज़ूर 1400 साल पहले इस जहां से जा चुके है और हज़रत अली व दीगर सहाबा ने उनको कब्र में उतारा और दफनाया ।
और ठीक वैसे ही आज पूरे देश मे दूसरी कम्युनिटी भी नारे लगती दिख रही है कि
आ रहे है मेरे राम
मेरे राम आ रहे है
बुनियादी बात ये है कि जज़्बात और अंधी अकीदत, अक्ल को खा जाती है , फिर वो अक़ीदतें चाहे किसी मज़हब के मानने वालों के यहां हों ।
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अब करने का काम ये है कि आगे से जब कभी कोई मौलवी तुमको बहलाने के लिए ये कहता दिखे कि
हुज़ूर आ रहे है, हुज़ूर तशरीफ़ ला रहे है
तो स्टेज पर चढ़ कर उसकी खोपड़ी के बाल पकड़ कर ये पूछना कि पिछले कई सालों से तुम यही बताते और लोरियां सुनाते आ रहे हो लेकिन हुज़ूर आज तक, अभी तक आये क्यों नही, तशरीफ़ लाये क्यों नही ।
अगर तुम आज से ये काम शुरू कर लो तो तुम्हारी नस्लों के ईमान की सलामती होगी वरना
आज राम आये है, कल कृष्ण आएंगे, परसों कोई और आएगा और तुम व तुम्हारी नस्लें, मौलवी की चटाई अफीम के नशे में टुन्न, मस्त और झूमते गाते रहोगे और एक दिन खुद भी शिर्क में मिल जाओगे ।
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ˡᶦᵏᵉ ᶜᵒᵐᵐᵉⁿᵗ ˢᵃᵛᵉ ˢʰᵃʳᵉ
Conclusion:
शरीयत में जज़्बात की न कोई अहमियत है और न ही कोई जगह है !दीन जज़्बात से नही बल्कि अल्लाह के अहकाम और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के फ़रमान से है !
हमने ऊपर दो अज़ीम हस्तियों - अबु बकर और उमर, दोनों का तर्ज़े अमल पढ़ा,इनमे से एक का अमल हक़ीक़त पर मबनी है, असल वाकया, जो घट गया, उसको कुबूल कर लेने पर मबनी है
और दूसरे का अमल सिर्फ अ़की़दत और मोहोब्बत पर मबनी है, जिसमे जज़्बात का गलवा है और हकीकत को नज़रंदाज़ करना !
FAQs:
Que: क्या दीन में जज़्बात की कोई जगह है ?
Ans: नही ! दीन में जज़्बात की कोई जगह नहीं है ! दीन जज़्बात से नही बल्कि शरीयत और अल्लाह के अह़काम से चलता है !
Que: अंधी अ़की़दत क्या है ?
Ans:अंधी अ़की़दत से मुराद बगैर सोचे समझे या बगैर सवाल किए किसी नज़रिया या रहनुमा या किसी बात की पैरवी करना है! इस्लाम इल्म व तहकीक को अहमियत देता है और अंधी अकीदत की मुखा़लिफ़त करता है क्योंकि ये इंसान को दीन से दूर करता है और इंसान ऐसे में अल्लाह के अहकाम की मुखा़लिफ़त करता है
कुरान और हदीस बार-बार इंसान को गौर ओ फिक्र करने की तलकीन करता हैं। फिर भी, कुछ लोगों में अंधी अकीदत देखने को मिलती है !
Que: क्या नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी क़बर में जिंदा हैं ?
Ans: नही ! नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी क़बर में जिंदा नहीं है बल्कि अपने रब के पास जन्नतुल फ़िरदौश में ज़िंदा हैं!


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